चलो मोहब्बत की खुशबु हर जगह फैलाया जाय, मज़हबी नफ़रत के बुतों को कब्र में दफ़नाया जाया
बेवफाई सेे या रब बहुत रूंसवा मुहब्बत हो गयी है ,
दगाबाजों पर मुफीद कौन सा दफा लगाया जाए ा
गजल ज़नाब रख्त ए सफ़र खोलिए उठिए उम्मीद ए दर खोलिए भटकते रास्ते मिले हैं शहर में दिलअजीज आये घर खोलिए यूं रात भारी कटी होगी ज़रूर जरा ये उम्मीद ए नज़र खोलिए खिलने से पहले मुरझाई कली इसके ये जख्मे जिगर खोलिए रुंसवा न होने पाएं ये मोहब्बतें खुशीके दरवाजे जफर खोलिए शुक्रिया रहगुज़र होने के लिए मगर ये पर बंधे हैं पर खोलिए आंखों में इश्क़ के फूल खिले अब तोये दीदा ए तर खोलिए डा0 तारा सिंह अंशुल
यूं मोहब्बत का हक़ तुम अदा करना जरूर , ये इश़्क भरे दिल तो कभी होते नहीं मगरूर ! जिनकी सुनी आंखों में नूर सिर्फ प्यार का है , पत्थर दिल नहीं अगर है किस बात का गुरुर ! डा0 तारा सिंह अंशुल
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