मुक्तक उम्मीद ए दर खोलिए

             गजल 

ज़नाब रख्त ए सफ़र खोलिए
उठिए उम्मीद ए  दर खोलिए

भटकते रास्ते मिले हैं शहर में
दिलअजीज आये घर खोलिए

यूं  रात भारी कटी होगी ज़रूर
जरा ये उम्मीद ए नज़र खोलिए

खिलने से पहले मुरझाई कली 
इसके ये जख्मे जिगर खोलिए

रुंसवा न होने पाएं ये मोहब्बतें
खुशीके दरवाजे जफर खोलिए

शुक्रिया रहगुज़र होने के लिए
मगर ये पर बंधे हैं पर खोलिए

आंखों में इश्क़ के फूल खिले
अब तोये दीदा ए तर खोलिए

                     डा0 तारा सिंह अंशुल

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