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Showing posts from 2017
गीत :-- " प्रेम भी दुनिया मे हो गया बाजार है "
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प्रेम भी दुनियां में हो गया बाजार है , स्वर्थ के वसीभूत हो रहा ये प्यार है ! छल कपट धोखा लोग करते हैं क्यों फ़रेब करते हुए भी नहीं डरते हैं क्यों धरती पर जीवन गर है जीत है हार है प्रेम यह दुनियां में हो गया बाजार है अक्सर बेवफ़ाई का मारा है आदमी रूसवाई तन्हाई में जी रहा है आदमी, नफ़रतों के साथ इस जीवन में प्यार है यूं प्रेम यह दुनियां में हो गया बाजार है प्यार निश्छल हो खुशबू हो वफ़ा की , मोहब्बत नहीं है नुकसान या नफ़ा की ! प्रेम के विऱोध में सारा यह संसार है ! क्यूं प्यार के बगैर हर कोई बेेेज़ार है ! यूं विरह वेदना में हासिल कहां खुशी , ज़माने से डरकर प्रेमी करते ख़ुदकुशी ! हर दिल की आरज़ू तमन्ना तार तार है ! पर सच है ये प्रेम का भूखा ये संसार है ! "डा0 तारा सिंह अंशुल "
1-बसन्त आ गया है गुलशन निखर गया है 2:--हकीकत है ये ख़ामोशी हमेशा चुप नहीं रहती
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बसंत आ गया है गुलशन निखर गया है , येफूल खिल गए हैं खुशबू बिखर गया है ा खुशी में झूमती हैं खेतों में गेहूं बालियां , महक रही फिजा हरी हैं ये हरियालियां ा उपवनों में बादलों संग नाचते ये मोर हैं , हवा में भी उमंग है पुरवाईयों में शोर है ा कहीं आरजू समेटे जीवन ठहर गया है ा घुला संमा मेंभी ऋतुराज की मदहोशियां , करती हैं गुफ्तगूं मौसम से ये ख़ामोशियांा कूक रही कोयल है महकती अमराइयां , गम है कहीं जिंदगी में कहीं है तनहाइयां , प्यार की है आहट हर दिल सिहर गया है ा कली खिली कुसुम बनी मन हुआ नुरानी , बर्फ सी श्वेत सुलभ ऊषा किरन सयानी ा हर सुबह है दिवाना हर शाम हुई दिवानी , मदहोश हुई मोहब्बत रंगीनियां निशानी ा मधुमास है रूमानी हरओर पसर गया है ा बसन्त आ गया है गुलशन निखर गया है ा 2 :---- हकीकत में ये ख़ामोशी हमेशा चुप नहीं रहती , मौन होकर दिल की बातें ख़ामोशी से येकहती ा 3 :--- आओ इक दूजे को प्यार दें जीने को बस ये आधार दे ा क्या कोई रह पाया हमेशा हो जग में कोई नाम बताएं ा कोई है क्या दुनिया मैं यहां जिसने नहीं की है खताएं ा गुल खिलें आओ बहार दें ा जीने का बस ये आध...
गीत :- राजनीति है राज नर्तकी
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राजनीति है राज नर्तकी जग इसका दिवाना है ा सच्चे झूठे पासे फेके काम इसका मनमाना है ा बडे बडों को जब चाहे ये फांस लेती है जाल में , कभी सडक नाच दिखाती कभी नाचती हाल में ा जन गण मनको बहलानाही इसका अफ़साना है ा राजनीति है राज नर्तकी ----------------------------ा स्वार्थ मे वादे सच्चे करती बगल में रखती है छुरी, कुछ तो लोभ है आमजन करे इसी की जी हुजूरी ा इकलौती मालकिन है ये हर नेता का ठिकाना है ा राजनीति है राज नर्तकी --------------------------ा लोगों का कहना है कि सब कुछ जायज है इसमें, नहीं निभाती कोई वादा ये नहीं खाती है कसमें ा लोकतंत्र की है ये जरूरत इसी का ताना बाना है ा राजनीति है राज नर्तकी ----------------------------ा जब चुनाव आ जाता है हर गांव शहर टहलती है , बुरे कर्म का बुरा नतीजा जीत के लिए हहरती है ा इसने तो निज स्वार्थ में ही जाति धर्म पहचाना है ा ...