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    मुक्तक राज़ द्वय  01–        " स्त्री ही हूं कोई नामवर नहीं " मुझे पता है मुझ पर तुम्हारी क्यों है नज़र नहीं मैं तो एक सामान्य स्त्री ही हूं कोई नामवर नहीं मगर संभाले हूं मैं अपनी आबरू निज कंधे पर रखती हूं मैं अपना सतर्क वजूद हूं बेख़बर नहीं                डा० तारा सिंह अंशुल 02–           " सभी तो दूर हो गये " बेख़बर नहीं हैं  कोई मगर  मजबूर हो गये  यूं प्रिय जन प्रिय वस्तु  सभी तो दूर हो गये वक्त की तेज आंधी में धूल जमे रिश्तों पर परायेपन में पगे रिश्ते ख़ू के मशहूर हो गए                डा० तारा सिंह अंशुल मेरा नाम हो जाये मै भी मशहूर हो जाऊं मै बुराइयो से हमेशा के लिए दूर हो जाऊ दूर हो जाये हर बुराई यूं इस जमाने से भी आसमां की परी दिलों का गुरूर हो जाऊं                       ...

"हम तो वक्त से हारकर" सर झुकाएँ खड़े थे ! सामने खड़े कुछ लोग ख़ुद को बादशाह समझने लगे..!!

यूं  मोहब्बत का हक़ तुम अदा करना जरूर , ये इश़्क भरे दिल तो कभी होते नहीं मगरूर ! जिनकी सुनी आंखों में नूर सिर्फ प्यार का है , पत्थर दिल नहीं अगर है किस बात का गुरुर !               डा0 तारा सिंह अंशुल

मुक्तक उम्मीद ए दर खोलिए

             गजल  ज़नाब रख्त ए सफ़र खोलिए उठिए उम्मीद ए  दर खोलिए भटकते रास्ते मिले हैं शहर में दिलअजीज आये घर खोलिए यूं  रात भारी कटी होगी ज़रूर जरा ये उम्मीद ए नज़र खोलिए खिलने से पहले मुरझाई कली  इसके ये जख्मे जिगर खोलिए रुंसवा न होने पाएं ये मोहब्बतें खुशीके दरवाजे जफर खोलिए शुक्रिया रहगुज़र होने के लिए मगर ये पर बंधे हैं पर खोलिए आंखों में इश्क़ के फूल खिले अब तोये दीदा ए तर खोलिए                      डा0 तारा सिंह अंशुल
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