मुक्तक राज़ द्वय
01–
" स्त्री ही हूं कोई नामवर नहीं "
मुझे पता है मुझ पर तुम्हारी क्यों है नज़र नहीं
मैं तो एक सामान्य स्त्री ही हूं कोई नामवर नहीं
मगर संभाले हूं मैं अपनी आबरू निज कंधे पर
रखती हूं मैं अपना सतर्क वजूद हूं बेख़बर नहीं
डा० तारा सिंह अंशुल
02–
" सभी तो दूर हो गये "
बेख़बर नहीं हैं कोई मगर मजबूर हो गये
यूं प्रिय जन प्रिय वस्तु सभी तो दूर हो गये
वक्त की तेज आंधी में धूल जमे रिश्तों पर
परायेपन में पगे रिश्ते ख़ू के मशहूर हो गए
डा० तारा सिंह अंशुल
मेरा नाम हो जाये मै भी मशहूर हो जाऊं
मै बुराइयो से हमेशा के लिए दूर हो जाऊ
दूर हो जाये हर बुराई यूं इस जमाने से भी
आसमां की परी दिलों का गुरूर हो जाऊं
डा0 तारा सिंह अंशुल
Comments
Post a Comment