1-बसन्त आ गया है गुलशन निखर गया है 2:--हकीकत है ये ख़ामोशी हमेशा चुप नहीं रहती

बसंत आ गया है गुलशन निखर गया है ,
येफूल खिल गए हैं खुशबू बिखर गया है ा
खुशी में झूमती हैं खेतों में गेहूं बालियां ,
महक रही फिजा हरी हैं ये हरियालियां ा
उपवनों में बादलों संग नाचते ये मोर हैं ,
हवा में भी उमंग है पुरवाईयों में शोर है ा
कहीं आरजू समेटे जीवन ठहर गया है ा
घुला संमा मेंभी ऋतुराज की मदहोशियां ,
करती हैं गुफ्तगूं मौसम से ये ख़ामोशियांा
कूक रही कोयल है महकती अमराइयां ,
गम है कहीं जिंदगी में कहीं है तनहाइयां ,
प्यार की है आहट हर दिल सिहर गया है ा
कली खिली कुसुम बनी मन हुआ नुरानी ,
बर्फ सी श्वेत सुलभ ऊषा किरन सयानी ा
हर सुबह है दिवाना हर शाम हुई दिवानी ,
मदहोश हुई मोहब्बत  रंगीनियां निशानी ा
मधुमास है रूमानी हरओर पसर गया है ा
बसन्त आ गया है गुलशन निखर गया है ा

2 :----
हकीकत में ये ख़ामोशी हमेशा चुप नहीं रहती ,
मौन होकर दिल की बातें ख़ामोशी से येकहती ा

3 :---
आओ इक दूजे को प्यार दें
जीने को बस ये आधार दे ा
क्या कोई रह पाया हमेशा
हो जग में कोई नाम बताएं ा
कोई है क्या दुनिया मैं यहां
जिसने नहीं की है खताएं ा
गुल खिलें आओ बहार दें ा
जीने का बस ये आधार दें ा
बढती नफरत को हम रोके ,
आने न पाये ईष्या के झोंके ा
प्रेम की सरिता मृदुल बहाएं ,
फलती फुलती रहे आशाएं ा
जीवन सबका यूं संवार दें ा
      " तारा सिंह अंशुल "

4:---बरदान ये कुदरत का
ठंडी हवांयें झील ये सागर सरितायें सोता,
वरदान ये कुदरतके इनका दाम नहीं होता ा
जंगल की अपनी दुनियां है शजर हैं विशाल ,
पशु-पक्षी कीट पतंग जीव जंतु हैं बेमिसाला
ईश्वरीय सत्ता एक जिसका नाम नहीं होता ा
नियम हैं कायनात का चलता है ये हरओर ,
जोर है तूफानों का जहां जलजला चहुंओर ा
यहां आंधियों के आने का पैगाम नहीं होता ा
ये जंगलों को काट कर शहर दर शहर बना ,
इसीलिए इंसानों पर  प्रकृति का कहर ठना ा
गजब हाल होता बुरा यूं सरेयाम नहीं होता ा

5.:-----
                " तारा सिंह अंशुल " गोरखपुर
          " गीत " नाजुक पंख तितलियों के "
नाजुक पंख तितलियों के
मत छूना टूट के बिखरेगा !
प्यार से गर सहलाओगे तो ,
ज़रूर ये खिलके निखरेगा !
                  सुन ! ओ भंवरे !

मत छेड़ो सुकुमार हैं परों को !
इनके हौसलों को परवाज दो !
भरें उड़ान अम्बर में उन्मुक्त !
परियों सा रंगीं इन्हें साज दो !
                    सुन ! ओ भंवरे !

अति सावधान भीरहना होगा!
बाज झपट कर इन्हें  न नोचे !
मसल न पाये कोई इन्हें कभी!
शिकारी पलटके इन्हें न कोंचे !
                  सुन ! ओ भवरे !
               " तारा सिंह अंशुल "

6:- गीत :-- " जब जब वो मिले शाम रंगीन हुई "
जब जब वो मिले शाम रंगीन हुई  ,
कभी जब नआये तो गमगीन हुई ा
इशारों में लोगों का कहना ये क्या ,
बातें ये किस तरह की हुई हैं बंया ा
ये सरेयाम महफिल में तौहीन हुई ा
जब जब वो मिले शाम रंगीन हुई ा
सामने से गुजरते वोपहचानते नहीं ,
अजब ये लगे कि हमें जानते नहींा
जैसे उनकीमोहब्बत गरजहीन हुईा
जब जब वो मिले हैं शाम रंगीन हुई ा
तौबा वो तो सनम अंधेरे के निकले ,
यूं कैसे हम लगा सकते उनको गले ा
खूबसूरत ये ज़िन्दगी भी बेदीन हुई ा
जब जब वो मिले हैं शाम रंगीन हुई ा
              " तारा सिंह अंशुल  "

























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