गीत :- राजनीति है राज नर्तकी

राजनीति है राज नर्तकी  जग इसका दिवाना है ा
सच्चे झूठे  पासे फेके  काम इसका मनमाना है  ा
बडे बडों को जब चाहे ये फांस लेती है जाल में  ,
कभी सडक नाच दिखाती कभी नाचती हाल में ा
जन गण मनको बहलानाही इसका अफ़साना है ा
राजनीति है राज नर्तकी ----------------------------ा
स्वार्थ मे वादे सच्चे करती बगल में रखती है छुरी,
कुछ तो लोभ है आमजन करे इसी की जी हुजूरी ा
इकलौती मालकिन है ये हर नेता का ठिकाना है ा
राजनीति  है राज नर्तकी  --------------------------ा
लोगों का कहना है कि सब कुछ जायज है इसमें,
नहीं निभाती कोई वादा ये नहीं  खाती है  कसमें ा
लोकतंत्र की है ये जरूरत इसी का ताना बाना है ा
राजनीति है राज नर्तकी ----------------------------ा
जब चुनाव आ जाता है हर गांव शहर टहलती है ,
बुरे कर्म का बुरा नतीजा जीत के लिए हहरती है ा
इसने तो निज स्वार्थ में ही जाति धर्म पहचाना है
                                " तारा सिंह अंशुल  "

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