गीत प्यार का

जिसने सिखाया प्यार  की भाषा ,
दिल में मेरे वहीे रहता सधा सा ा
बन पर्वत नदियों का वो सरगम,
लहराता है वो इश्क़ का परचम ाा
जिसमें है जीव जगत प्रत्याशा ाा
जिसने सिखाया प्यार की भाषा ाा
धरा गगन के कण कण में है ,
जल थल जीव के वन्दन में है ा
जिसके लिए मन मेरा प्यासा ाा 
जिसे लिखूं मैं नित्य जरा सा ाा
सारे जहाँ में है जिसकी रवानी,
खुश रहती जिससे जिन्दगानी ा
वही तो है मेरा मन जिग्याशा ाा
जिसे लिखू्ं मैं नित्य जरा सा ाा
जन जीवन जिसके वन्दन में ,
जीव जगत के वो मूक अर्चन में ा
वही मेरे मन की है अभिलाषा ाा
जिसे लिखूं मैं नित्य जरा सा ा
जिसने सिखाया प्यार की भाषा ाा
वही है दुनियां की  परिभाषा ाा


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